काला-अज़ार (Kala-azar) एक गंभीर परजीवी रोग है, जिसे चिकित्सा विज्ञान में आंतरिक लीशमैनियासिस (Visceral Leishmaniasis) कहा जाता है। यह रोग Leishmania नामक परजीवी के संक्रमण से होता है। भारत के कुछ राज्यों में यह रोग लंबे समय से एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या रहा है।
काला-अज़ार का रोगवाहक
काला-अज़ार का मुख्य रोगवाहक मादा सैंडफ्लाई (बालू मक्खी) होती है। भारत में Phlebotomus argentipes प्रजाति की सैंडफ्लाई इसके प्रसार में प्रमुख भूमिका निभाती है।
संक्रमित व्यक्ति को काटने के दौरान सैंडफ्लाई Leishmania परजीवी को अपने शरीर में ले लेती है। जब यही संक्रमित सैंडफ्लाई किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटती है, तो परजीवी उसके शरीर में पहुंच सकता है और संक्रमण हो सकता है।
काला-अज़ार कैसे फैलता है?
काला-अज़ार सामान्यतः संक्रमित सैंडफ्लाई के काटने से फैलता है। सैंडफ्लाई आकार में बहुत छोटी होती है और आमतौर पर गर्म तथा नम स्थानों में पाई जाती है। इसके काटने के बाद Leishmania परजीवी शरीर में प्रवेश करता है और धीरे-धीरे आंतरिक अंगों को प्रभावित कर सकता है।
काला-अज़ार के प्रमुख लक्षण
काला-अज़ार के लक्षण धीरे-धीरे दिखाई दे सकते हैं। इसके प्रमुख लक्षण हैं:
- लंबे समय तक रहने वाला बुखार
- शरीर का वजन कम होना
- कमजोरी और थकान
- तिल्ली (Spleen) का बढ़ना
- यकृत (Liver) का बढ़ना
- त्वचा का रंग गहरा होना
- खून की कमी (एनीमिया)
यदि समय पर उपचार न किया जाए, तो यह रोग गंभीर और जानलेवा भी हो सकता है।
बचाव कैसे करें?
काला-अज़ार से बचने के लिए सैंडफ्लाई के संपर्क से बचना महत्वपूर्ण है। इसके लिए मच्छरदानी का प्रयोग, घर के आसपास साफ-सफाई रखना तथा सैंडफ्लाई के प्रजनन वाले स्थानों को कम करना उपयोगी उपाय हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
रोग: काला-अज़ार (Visceral Leishmaniasis)
कारक: Leishmania परजीवी
रोगवाहक: मादा सैंडफ्लाई
भारत में प्रमुख वाहक: Phlebotomus argentipes
अतः परीक्षा की दृष्टि से याद रखें: काला-अज़ार का रोगवाहक मादा सैंडफ्लाई है।
(NO MISTAKE)













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